रविवार, 14 मई 2023

दिवाली की सुबह

 दिवाली की रात की सुबह

मैंने घर के बाहर

लॉन में, ओसारे पर

फटे हुए, बुझे हुए, चुके हुए

आतिशबाजी के वीरों को पड़ा देखा

सभी मर चुके थे

और चारों और सन्नाटा पसरा था।


उन्नीस सौ सैंतालीस

पंद्रह अगस्त की सुबह

महाभारत युद्ध के बाद की

कुहिलिकाच्छन्न सुबह।


नजर दौड़ाई चारों ओर

न कोई कुंती थी

न गांधारी

न सुभद्रा।

उत्तरा मर चुकी थी

भ्रूण को पेट में लिये।


काहे का परीक्षित?

कृष्ण अगोचर थे।


तब से अब तक

सन्नाटे का साम्राज्य है

धर्म की स्थापना के नाम पर।

मंगलवार, 28 सितंबर 2021

श्रद्धा सबूरी

उनके हाथों में दे देना 

एक टुनटुनी 

कहना, बेटे, गाओ आरती 

यही भक्ति है, यही भारती 

यही तुम्हारा संविधान है 

जपो, जपो, भारत महान है 

मजहब तेरा वोटदान है 

पितृपक्ष में पिंडदान है 

किसका कौन चुनाव चिह्न है 

यही जानना महाज्ञान है 

नकल करो डिग्रियां लूटने 

यही तुम्हारा इम्तहान है 

बनो विश्वगुरु नाम कमाओ 

यही योग्यता, यही शान है

ले बेटे, जब भूख लगी हो 

बजा-बजाकर यही झुनझुना 

पानी पीना, धैर्य न खोना 

भूखा मरना देशप्रेम है 

यही आमरण अनशन तेरा 

तेरी श्रद्धा का प्रमाण है।

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

दूरदृष्टि

मैं अपनी पीड़ा को 

आंसू बन बहने नहीं कहता 

नहीं करना चाहता हूं उन्हें अपने हृदय से दूर 

पर वे बेटे-बेटियों की तरह दूर होना चाहते हैं मुझसे 

नौकरी के लिए, शादी के लिए, अपने घर बसाने के लिए।

 मेरी आंखें सूनी हो जाती हैं तकती हुई राहें क्षितिज में, 

और लोग कहते हैं कि बूढ़ों को दूरदृष्टि होती है। 

हां, मैं सहमत हूं, आंखें पिरोये दूर तक क्षितिज में 

तकते हुए उनकी वापसी की राह।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

अर्धसत्य

मध्यरात्रि में मेरी नींद टूट गयी
किसी उल्लू के चीखने की-सी आवाज से
तो देखा कि एक नरकंकाल दरवाजे की तरफ से
मेरे बिस्तर की ओर आ रहा है।

अचरज भी हुआ, और डर भी लगा
हालांकि मैं नास्तिक आदमी हूं
भूत और भगवान को कल्पना कहता हूं
लेकिन कहां से घुस आया यह साला कंकाल
कमरे का दरवाजा तो यकीनन बंद था।

मुझे सहमा हुआ देखकर 
खिटखिटा कर हंसा कंकाल
बोला, निकल गयी हवा?
बड़े इंटेलेक्चुअल बनते हो
हमारे अस्तित्व पर हंसते हो।

कांपती देह और मिमियाती जुबान से
मैंने पूछा, सच-सच बताओ, कौन हो तुम?
बोला कंकाल, मैं सच ही कहूंगा
मैं स्वयं सत्य हूं, 
मैं विवश हूं, झूठ बोल ही नहीं सकता।

मैंने कहा, सो तो ठीक है
लेकिन तुम इतने डरावने, फटेहाल, भूत-से क्यों हो?
अपनी हालत ऐसी क्यों बना रखी है,
क्यों आये हो इस अर्धरात्रि में मेरे पास,
क्या करने, क्या कहने?

बोला कंकाल, इस पूरे शहर में
तुम अकेले नास्तिक हो
तुम्हें छोड़कर सारे लोग आस्तिक हैं
वे भगवान को मानते हैं, शास्त्रों में आस्था है उनकी
वे नहीं मानेंगे मेरी बात, झूठा कहकर हलतार देंगे।

मैं प्रकृतिस्थ हुआ, जान में जान आई
मैंने जरा प्रगल्भ होकर कहा कंकाल से
कि चलो, अपनी बात कहो
सुन तो लूं कि तुम क्या कहते हो
नास्तिक हूं, यकीन कर लेने का वचन नहीं दूंगा।

बोला कंकाल, मैं आखिर जीत ही गया
सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते।
मैंने झुंझलाकर कहा, कौन सी नयी बात है यह!
यह तो सभी जानते हैं, सभी मानते हैं,
यही कहने आ गये तुम, आधी रात में?

कंकाल ठिठियाया, बोला, जानते हों?
सत्यमेव जयते अर्धसत्य है।
मैंने पूछा, तो पूर्णसत्य क्या है?
कैसी-कैसी बातें कहते हो!
चलो, बतलाओ, पूर्णसत्य क्या है?

बोला कंकाल, सुनो, मुझे झूठ ने फंसाया मुकदमे में
ऊपर से नीचे तक पैसा खिलाया
जमीन बिकवायी, जेल भिजवाया
मेरी पत्नी ने आबरू बचाते हुए जान दे दी
मेरा बच्चा बेसहारा मर गया।

अंत में मुझे न्यायालय ने पाया निर्दोष
घर लौटा तो जीवन निरर्थक लगा
मैंने कर ली आत्महत्या, मैं अब प्रेत हूं
सत्य जीता जरूर, मैं गवाह हूं
लेकिन भैया, हार किसे कहते हैं?






मंगलवार, 27 जुलाई 2021

अवशिष्ट

तेरी हर चीज ठिकाने लग गई 

चूड़ियां

साड़ियां 

चादरें 

गहने 

पैसे 

घर 

अचार। 

मैं अकेला बचा हूं। 

इसे न बंटने दूंगा 

तेरा रहा हूं 

तेरा रहूंगा।

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

ओड टु जस्टीसिया

अरे, ओ न्याय की देवी

तू अगर अंधी है

तो पट्टी क्यों बांध रखी है

आंखों पर?

पक्की जाहिल हो क्या?

या कि तुम्हारे मूर्तिकार

बछिया के ताऊ हैं?

पट्टी उतार कर फेंको

देखो, शायद दिख जाए कुछ।


अगर तुम सचमुच अंधी हो

तो तेरी तराजू के पलड़े

किस तरफ झुके हैं

यह कैसे लौकेगा तुम्हें?

कैसे दिखेगा,

कि पलड़े पर

एक तरफ अत्याचार

और दूसरी तरफ

नोट की गड्डियां हैं

या, एक तरफ रेप है

और दूसरी तरफ

रुसूख है?


अरे, ओ फूहड़ देवी,

गांधारी की ऐक्टिंग मत कर

कूड़मगज! देख, सुन और समझ,

दुर्योधन पर लगाम लगा, धृतराष्ट्र का बैंड बजा

शकुनि को चलता कर

भारत बचा, महाभारत से बच।


यह बेवकूफी की इंतहा है

छोड़ यह नाटक।

अगर तेरा दिमाग सुन्न हो गया है तो

किसी अंध-वधिरालय में जाकर जम जा

रोटी के लाले नहीं पड़ेंगे

बहुत सारी सरकारी स्कीम्स  हैं

विकलांगों के लिए।

सरकार तुम्हें मरने नहीं देगी।

शुक्रवार, 18 जून 2021

सब्र के बांध

सब्र के बांध

मत टूटो

नहीं तो मैं डूब जाऊंगा

आंसुओं के सैलाब में।

बारिश नाम नहीं लेती

थमने का

बदनसीबी की घटाओं ने

घेर रखा है मेरा नीला आसमान।

दुनियां भर की नफ़रत

बद्दुआओं की भाप

हर दिल की जलन

हिकारत का धुआं

मामूनियत की तलाश

चट्टानों पर ले आयी

बिल्कुल  तन्हा हूं

थामे सांसों की डोर।

तुम टूटोगे

तो टूटेगी डोर भी

फिर कहना नहीं

कि मरहूम अच्छा इंसान था।