मंगलवार, 29 जुलाई 2014

आज कर लें गुफ़्तगू जी खोल कर


बोझ दिल पर था  ज़माने से पड़ा 
आज वह हलका करें कुछ बोल कर 

घूँट पीकर भी ज़हर का, बोलते 
बात अपनी चाशनी में घोल कर 

शिद्दतों में जिंदगी गुज़री, मग़र 
उफ़ नहीं कहते बना मुँह खोल कर    

आँसुओं में रात ग़र कटती रहे  
क्यों रखें सबंध ऐसे जोड़  कर 

आसमाँ  की कहकशाँ को मैं चला 
दर्द सारे इस ज़मीं पर छोड़ कर 

क्या बताएँ  हम कि कल  होंगे कहाँ
आज कर लें गुफ़्तगू जी खोल कर 

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मेरा घर है कारागार


आगे लोहे के दरवाजे 
पीछे पथ्थर  की दीवार 
दाँये बाँये अंधी गलियाँ 
मेरा,  बस, इतना संसार  
 
रात और दिन क्या होते हैं ?
क्या नभ का आकार-प्रकार ? 
हवा,. बता दे, कैसा  लगता 
इन दीवारों के उस पार  

वर्ष, महीने, दिन गुजरते 
फिर क्या  उम्र गुजरती है ?
जीवन, मृत्यु, निराशा, आशा  
केवल  शब्दों का व्यभिचार        
   
हँसना, रोना, कहना, सुनना,
सोने, जगने का व्यापार
अर्थहीन मेरे हित सब कुछ 
मेरा घर है कारागार  

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मत करो किसी का इंतज़ार


शिशिर-शीर्ण निष्पर्ण वृन्त
बिखरे, वीणा के भग्न तार
खँडहर अतीत प्रासादों के
किसका, क्यों, करते इंतज़ार ?

हो किसी विजन प्रांगण में स्थित 
चिर-स्वप्निल प्रेमी की मज़ार
धूसरित, उपेक्षित, खग-विष्ठित,
किसका, क्यों, करते इंतज़ार ?

दूध-से धवल ज्योत्स्ना-शीतल 
एक  मसृण दुपट्टे में  सँवार
आएगी कोई दीप लिए 
करते क्या  उसका इंतज़ार ?

भूल जा, दोस्त,  भ्रम छोड़, यार,
शब्दाडंबर हैं, स्नेह, प्यार,
तुम हो अतीत, तुम हो विराम,
मत करो किसी का इंतज़ार  

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शाम सहसा ढल गयी है


धूप ओझल हो गयी है  

जो जहाँ हैं, लौटने को हो रहे तैयार 
काम  का वैसे पड़ा है सामने अंबार 
अब करेंगे, अब करेंगे, हो गयी दुपहर 
सोचने में और गुजरा एक अन्य प्रहर  

डूबने को जा रहा मसि-सिंधु में संसार  
मच्छरों की फ़ौज़ है उन खिड़कियों के  पार 
हैं वहीं  टकरा रहे चमगादड़ों के पर 
गूँजते हैँ हर तरफ बस झींगुरों के स्वर  


ऊँघते उल्लू जमे हैँ शाख पर हर ओर 
उस तरफ से रहा है शावकों का शोर 
दूर तक दिखता नहीं है रौशनी  का श्रोत 
कर सकेंगे राह रौशन ये निरे खद्योत ?  

शाम सहसा ढल गयी है  

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