शनिवार, 1 अगस्त 2015

ऋतुसंहार

इतनी तेज धूप,
कि आँखें चौंधियाती हैं,
गरम हवा के झोंके 
डाल जाते आँखों में सड़कों की धूल,
लाल-लाल सूजी ऑंखें देखती हैं
नीम की शाख से लटकते बर्रे का छत्ता;
कई बच्चे हो चुके हैं चेचक से रुग्ण,
माता के गीत 
और नीम डाली की हवा ही आसरे हैं,
महीनों से हस्पताल के किवाड़ नहीं खुले,
कौन सा डॉक्टर और कहाँ की दवा!

कालिदास,
ऋतुसंहार में तुम ने लिखा था 
सर्वं प्रिये चारुतरं वसंते। 

ओ कालिदास,
राजा के दरवार में सब कुछ चारुतम  रहा होगा,
पर जनता के भाग्य में
धूल, धूप, उठी आँख, चेचक,
बर्रे के छत्ते और सदा बंद हस्पताल। 
नीम के पत्तों और माता के गीत के 
सहारे के सिवा
मैं कुछ भी शिव या सुंदर नहीं देखता
तेरे वसंत में।             

शनिवार, 4 जुलाई 2015

प्रलाप

उन इबारतों को पढ़कर मैं अर्थ ढूँढता,
जो सदियों की गर्मी, सर्दी, बरखा खाकर,
काली, उजली, उलझी, धुँधली रेखाएँ हैं,
चेहरे पर जैसे यादों के अश्रु  सूखते,
ज्वार छोड़ते जैसे बालू पर  हस्ताक्षर।

मेरे कहने का अब कोई अर्थ न लेना,
मैं अतीत से बातें करता बोल रहा हूँ,
गह्वर से आती ध्वनि-प्रतिध्वनि की बौछारें 
इंगित करती नहीं श्रोत ध्वनि का, ठगती हैं;
उस प्रलाप को भ्रमवश तुम संलाप न कहना। 

मैं मिट्टी का पूत, तुम्हारा नभ ज्योतिर्मय,
मैं त्रसरेणु निरीह, और आलोक-किरण तुम,                      
मेरा क्या उत्थान, क्या पतन, या फिर विचरण,
मैं करता हूँ महज़ प्रतीक्षा एक फूँक की,
जो ढकेल देगी मुझको निःशेष तिमिर में।    
   
वर्तमान क्या, क्या भविष्य है उस रजकण का,
जो  क्रीड़ा-कंदुक है सांसों के हाथों में,
जिसका आलोकित अथवा तमवेष्ठित होना
निर्भर है आलोक-किरण पर, जो आती है,
उन होठों से जो करते  व्यंगोपहास हैं!           

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

जीती रह पुत्तर

मैंने अपनी नन्हीं पोती से सवाल किया 
चार गुने दो कितने होते है ?
उसने कहा "जी" 
और  कॉपी पर लिखा g
मैंने उसका उत्तर सही किया और लिखा 8
वह बोली, दादा जी, 
कल आपने ही तो मना किया था 
जीरो को जीरो से डिवाइड नहीं करते। 

फिर मैंने पूछा 
अच्छा, यह तो बताओ 
कि चार प्लस दो 
और चार माइनस दो 
इन दोनों में 
कौन बड़ा होता हैं?
वह हँसी, फिर बोली,   
तीनों एक ही तो हैं,
एक के ही तीन नाम। 

मैं चकराया, और पूछा, सो कैसे?
उसने समझाया, कल आपने ही बताया,
चौबे जब छब्बे बनने जाता है,
आधी रात दूबे बन घर लौट आता हैं,
फिर भी, चौबे अपनी पोती के लिए
जैसे का तैसा, दादा रह जाता है। 
नाम बदलने से क्या अंतर पड़ता है ?
घर में मेरा  नाम बिटटू  है,
स्कूल में वैदेही है,
अब  बतलाओ, मैं एक हूँ कि दो ?

मैं हो गया निरुत्तर,
बगलें झाँकते हुए मैंने कहा,
जीती रह पुत्तर।         

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

मुकाम

शहर  -  इमारतें-ही-इमारतें,
इमारतों पर इमारतें। 

उस इमारत की चारदीवारी इक्कों की है,
पान का इक्का, हुक्म का इक्का , चिड़ी का इक्का …     

और वह देखो,
उसकी चारदीवारी में  दिख रहे बादशाह 
और  दूसरी मंजिल पर बेगम-ही-बेगम। 

उसकी परली ओर 
नहले-ही-नहले,
सामने हटकर,
दहले-ही-दहले। 
नहलों से बढ़चढ़ कर 
दहलों का मकान। 

उनके पीछे हैं,
अट्ठे, पट्ठे, 
और सत्ते से दुड़ी तक। 

इस शहर को ग़ुरूर है
ताश के पत्तों से बने महलों का। 

यक़ीनन, यह नहीं जानता 
कि सबसे पुख्ता इमारत जमींदोज़ ताबूत की होती है,
जिसकी छत  पर तूफ़ान फ़िसल जाते हैं,
आसमान से उतर कर काली घटाएँ करती हैं आदाब अर्ज,             
आफ़ताब पेश आता है गुनगुने चाँद सा,
और सुबह की ताजी हवा आँगन बुहारती है। 

ओ मेरे ज़हीन दोस्त,
ले चल मुझे इन ताश के पत्तों से दूर,
उस मुकाम तक,
जो फूंक से न उड़ें,
झेल लें आँधी-तूफ़ान
और जलते जेठ की धूप। 

शनिवार, 28 मार्च 2015

ख़ुदा हाफ़िज़

मैं जानता हूँ 
कि  कोई किसी के साथ नहीं जाता।  
मैं भी जाऊँगा निपट अकेला(?) 
अंतहीन पथ पर 
निविड़ अन्धकार में। 
पर 
तुम बाहर तो आ सकते थे छोड़ने मुझे
कहने बाय-बाय 
अगरचे अ ड्यू कहना नहीं चाहते थे 
या बॉन व्वायेज कहने का साहस नहीं था।  

मैं जानता हूँ 
कि सपने सावधान करके नहीं टूटते
सपनों के साथी नहीं व्यक्त करते सहानुभूति 
नहीं देते शुभकामनाएँ 
बिछड़ने के पहले। 

ओ निर्मम,
बात तो खरी है 
कि न मैं तेरा था 
न ही तुम मेरे थे 
हमारा मिलना और कुछ समय का साथ    
रेलवे प्लेटफॉर्म पर था,
जहाँ मेरी गाड़ी पहले आ गयी। 
सच है कि हम नहीं मिलेंगे फिर कभी 
पर 
शिष्टाचार के तौर पर 
फिर मिलेंगे तो कह सकते थे!

यह मात्र भ्रम है 
कि मैं अकेला रहूँगा अपनी अनंत यात्रा में ;
मेरे साथ रहेंगे अंधकार,
नीरवता,
और तुम्हारे संग बिताये चंद लम्हों की यादें। 

तो  फिर, 
कहने दो मुझे ख़ुदा हाफ़िज़।    

रविवार, 1 मार्च 2015

काश, पछुआ न बही होती

डालियों को झकोरती
पछुआ हवा चली।  
टिकोले हो गए सारे भूलुंठित।

इतने छोटे थे वे
कि  उनका  अचार भी न बनता। 

टूट गए सपने। 

अब डालियों से रसाल नहीं टपकेंगे 
रस भरे, तूकर। 

टिकोले में गुठलियाँ भी न बनी थीँ      
सब थे बीजहीन, भविष्यहीन।   

काश, पछुआ न बही होती। 

ऊमस झेल लेते, पर गिरते नहीं टिकोले  
यदि न आयी होती पच्छिम से बयार !

रविवार, 14 दिसंबर 2014

मत दो मुझे निर्वाण के उपदेश

क्या दिया मैंने उस गाँव को 
जिसकी हवा में मैंने पहली साँस ली थी
जिसकी ज़मीन गलीचे सी नरम थी
जिस पर चलते मेरे  घुटने न छिले थे
जहाँ मैंने बोलना सीखा तुतला-तुतलाकर!

क्या दिया मैंने उस जराजीर्ण स्कूल को
जहाँ मैंने सीखा ककहरा,
बीसी तक पहाड़े
ए से एपल और बी से बुक,
जो अब भी काम आते हैं!

क्या दिया मैंने उस कॉलिज को
जिसने दी मुफ्त में शिक्षा 
और पहला वजीफ़ा,
जिससे खरीदी किताबें अब भी मेरे पास हैं 
यादगार के तौर पर !

क्या दिया मैंने लौटाकर उस शिक्षक को
जिसने सैकड़ों घंटे मुझपर लगाये 
पढ़कर मूक  सूखे ओठों के हरुफ़ 
जिसने मुझे नाश्ते भी कराये
निःशुल्क, अनमोल, विना मोल!

क्या दिया मैंने लौटाकर उस भाषा को,
जिसकी कविताओं ने स्पंदन जगाये
जिसकी कहानियों ने मेरा चरित्र सिरजा,
जिसके मुहावरे गहराई तक उतर गए हैं,
करती मुझमें आत्मज्ञान का संचारण!      

हाँ, मैं फिर जनम लूँगा,
बार-बार, एक नहीं, सौ जनम लूँगा 
चुकाने ऋण जो मुझ पर है,
यह मेरा निजी मामला है,
बाबाजी, मत दो मुझे निर्वाण के उपदेश। 


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