बकरे मिमियाते है
शेर दहाड़ते है
कुत्ते भूंकते है
गधे रेंकते हैं।
सांप फुंफकारते हैं
मेंढ़क टर्राते हैं
गवैये गाते हैं
मूरख चिल्लाते हैं।
फेसबुक पर सभी
अपनी-अपनी जात बता जाते हैं।
बकरे मिमियाते है
शेर दहाड़ते है
कुत्ते भूंकते है
गधे रेंकते हैं।
सांप फुंफकारते हैं
मेंढ़क टर्राते हैं
गवैये गाते हैं
मूरख चिल्लाते हैं।
फेसबुक पर सभी
अपनी-अपनी जात बता जाते हैं।
पुरखे हमारे
जन्मे और मरे भी वहीं
वह जमीन हमें ईश्वर ने दी थी
कुलदेवता ने
लेकर सौगंध
कि हम उसे आबाद रखेंगे
पितरों ने दी थी हमें मातृभूमि।
चिड़ियां भी चिपकी नहीं रहतीं
अपने घोंसलों से
भटकती हैं कहां नहीं
खाने की खोज में
लेकिन लौट आती हैं
शाम तक बसेरे में
हां, चिड़ियां भी।
हम नहीं घर लौटे
उस जादू की नगरी से
जहां परदेशी मेंढ़े बन जाते हैं
जादू असर करता है
पेट के रास्ते से दिलो-दिमाग पर
हमने कहा उसे अपना नया घर
कभी नहीं लौट पाए अपने घर।
हमें मिला पुरखों का अभिशाप
मा प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः
हां, वहीं, या फिर और कहीं,
भटक और कमा
वहीं सबकुछ गंवा
गज-भर ज़मीं भी न मिले
तुम्हें मातृभूमि में
भटकती रहे अंतिम राख
अनचीन्ही हवाओं में
ढूंढती मुकाम।
तुम मेरे सपनों में आए
लेकिन वह सपना लंबा था
टूट गया कुछ यादें देकर।
कल फिर तुम सपनों में आए
अपनी मैं कुछ बता रहा था
पर तुम को शायद जल्दी थी।
सोने जगने का क्रम शायद
उस मुहूर्त तक चला करेगा
जब तक सांसें रुकी नहीं हैं।
जब सो जाऊं चिरनिद्रा में
स्वप्निल आंखों में आ जाना
तब जाने की बात न करना।
ओ मेरे सपनों के साथी
मेरे ये सपने अपने हैं
ये तेरे मेरे सपने हैं।
सुनो और जानो
कि मैं भी तुम्हारी तरह
हाड़-मांस का बना सचेतन पुतला हूं
सरस्वती पूजा
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माँ सरस्वती, विद्यादायिनि,
किसी तरह डिग्री दिलवा दे
पर पढ़ने से साफ बचा ले
हर वसंतपंचमी दिवस पर
पूजन अर्चन किया करूंगा
डीजे के उद्दाम लयों पर
बेसुध नर्तन किया करूंगा
मूर्ति विसर्जन करके तेरी
जी भर दारू पिया करूंगा ।
कर दे थोड़ी कृपा, शारदे
किसी तरह डिग्री दिलवा दे
आजीवन गुणगान करूंगा ।