मंगलवार, 1 जून 2021

मैंने देखा

 नयी बन गयी बात पुरानी, मैंने देखा

बाढ़ बना दरिया का पानी, मैंने देखा

अपनी को बनते बेगानी, मैंने देखा

एक हकीकत बनी कहानी, मैंने देखा

हर पतंग को नभ में कटते मैंने देखा

हर प्यारे फुग्गे को फटते मैंने देखा।

अलविदा ओ परी

 पंख लगाकर समय उड़ गया 

वह तो है  कल की ही बात।

अग्निदेव को साखी रख कर

कसमें ली थीं हमने सात।


अग्निदेव  को सौंप तुम्हें मैं

लौट रहा अब खाली हाथ।

पंख लगा कर उड़ी गगन में

तुम चंचल परियों के साध।

वह मिला था

मैं भी ढूंढता था

अपने खोये भारत को

गली-गली, डगर-डगर

मन-ही-मन।


एक दिन उसे देखा

रेलवे प्लैटफॉर्म के पास

चीथड़ों में लिपटा

घूरे पर फिंके पत्तलों से

बीनकर कुछ खाता।


मैंने सोचा

क्या हालत हो गई

उस भले हाकिम की

जिसने न्याय करके

लिया था पंगा

जबर्दस्त शासन से।


मेरी गाड़ी आ गयी तब तक

मुझे ऑफिस पहुंचना था

दोपहर तक।

शनिवार, 22 मई 2021

क्यों न जल्द मरते

 बेटी को पढ़ाया

ब्याह उसका कराया

बेटी गयी ससुराल

समधी जी मालामाल।


बेटे को पढ़ाया

बहुत पैसा लुटाया

उसने घर अपना

किसी शहर में बसाया।


गांव में अकेले

हम पूजा पाठ करते

चाहत बस एक बची

क्यों न जल्द मरते!

पिशाचलोक

 मैं सोचता हूं कि भारत

ऋषियों का नहीं

पिशाचों का देश है

नहीं तो लाशों के कफ़न चुराकर

लोग व्यापार नहीं करते

और न ही सेंकते रोटियां

चिंताओं की आग पर।


कह दो, यार

मैं ग़लत सोचता हूं

तुम्हारा कहना झट मान लूंगा

आत्मप्रवंचना की खातिर।

रुदन

 मैं रोना नहीं चाहता

क्योंकि मैं एक धीर गंभीर पुरुष हूं

रोना तो कायरों या स्त्रियों की 

पुख्ता पहचान है।


लेकिन ये बेवकूफ आंखें

भर ही आती हैं

पलकें नहीं संभाल पाती हैं

आंसुओं का भार।


युंग कहते थे

कि मर्द के अचेतन में

एक अनिमा रहती है

एक प्रबल नारी

जो चेतन पर कभी-कभार

पड़ती है भारी।

जिंदगी

 मेरा दर्द कौन सुनेगा?

मेरी चीख कौन समझेगा?

मेरी चारों ओर लाशें ही लाशें हैं

या लाशों पर कपसते लोग

या लाशों पर बोली लगाते लोग

या लाशों से पैसे कमाते लोग

चिल्लाते लोग, बिलबिलाते लोग

इस कोलाहल में

कौन सुनेगा मेरी कराह?


मुझे कभी का मर जाना चाहिए था

कर लेनी चाहिए थी आत्महत्या

लेकिन मैं जिन्दा हूं

क्योंकि बेशर्म हूं

गंदी नाली का घिनाया कीड़ा हूं।

जानते हैं आप?

कीड़े नालियों में

बहुत दिन जीते हैं

मैं नहीं जानता

कि किसी कीड़े ने कर ली खुदकुशी

अपनी जिंदगी से ऊब कर

और यह भी नहीं जानता

कि कीड़े भारत के

नागरिक होते या नहीं होते।


कीड़े संविधान नहीं पढ़ते

वह तो आदमी ने आदमी के लिए रचा है

सुना है, उसमें 

नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर

लंबा लेक्चर है

पता नहीं, कीड़ों के मौलिक अधिकारों पर

क्या कहता है संविधान।