मंगलवार, 29 जुलाई 2014

जंगल


मेरी छाती पर उगते हैं रोज़ 
बिरवे ( नयी - नयी कामनाओं के)
बहुतेरे हो जाते हैं अकाल काल कवलित 
और कुछ बढ़ कर पेंड हो जाते हैं 
और कुछ दूसरे 
थककर नभ छूने के निरन्तर प्रयास से
ज़मीन से दूर हटते हटते
धराशायी हो जाते हैं 
देखता रहता हूँ मैं 
क्रम आवागमन का 
मैं तो जंगल हूँ  

मुझमें बसते हैं बाघ, भालू 
और जाने कितने दरिंदे 
किसी स्याह खोह में 
लटके रहते हैं असंख्य चमगादड़ 
ठेंगे पर ऊँचाई और जूती पर आसमान;
मुझमें बसते हैं हजारों खरगोश 
धवल, निरीहकोमल और चंचल 
स्नेह की खिलती धूप की तरह;
मैं सबको जानता हूं 
मैं तो जंगल हूँ  

रोज़ कटते हैं मेरे हरे - हरे पेंड 
मेरी जानकारी में होती  है पोचिंग 
कुछ  दाँत, सीँग और चमड़ों के लिये 
मेरे  हिरनों के लिये 
बाघ हैं, चीते हैं, भेंड़िये हैं 
और सबसे ऊपर आदमी हैं 
भूखे, आक्रामक, निर्दय लोभग्रस्त 
मैं दुआ माँगता हूँ उस चंचल छौने के लिए 
जो  कुछ नहीं समझता 
पर जिसकी नर्म चमड़ी से बनी जूतियां 
मुंहबोले दाम पर बिकती हैं 
इसके सिवा क्या कर सकता हूँ मैं
मैं तो जंगल हूँ  

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