मंगलवार, 29 जुलाई 2014

आज कर लें गुफ़्तगू जी खोल कर


बोझ दिल पर था  ज़माने से पड़ा 
आज वह हलका करें कुछ बोल कर 

घूँट पीकर भी ज़हर का, बोलते 
बात अपनी चाशनी में घोल कर 

शिद्दतों में जिंदगी गुज़री, मग़र 
उफ़ नहीं कहते बना मुँह खोल कर    

आँसुओं में रात ग़र कटती रहे  
क्यों रखें सबंध ऐसे जोड़  कर 

आसमाँ  की कहकशाँ को मैं चला 
दर्द सारे इस ज़मीं पर छोड़ कर 

क्या बताएँ  हम कि कल  होंगे कहाँ
आज कर लें गुफ़्तगू जी खोल कर 

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