शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

चादर-चुनरी के दाग आँसुओं से धो लेंगे

हम तो हुए राख सनम,
अब तुम्हें जलाएंगे
बाग़ के दो झुरमुटों में 
तनहा, गीत गाएंगे । 

कोयल की कूक में तुम 
व्यथा अपनी भर देना 
बाग के हर कोने को 
आह-ए-हिज़्र  कर देना।

पिहू-पिहू रटकर मैं 
तुम्हें याद कर लूंगा 
चाँद  की खूँटी पर 
टांग प्राण, मर लूंगा । 

सात जनम साथ नहीं 
हँस सके, तो रो लेंगे 
चादर-चुनरी के दाग,
आँसुओं से धो लेंगे । 

----

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें